सत साहित्य प्रकाशन एवं प्रचार प्रसार

आध्यात्मिक सत्पुरुष पूज्य गुरुदेव श्री कानजी स्वामी के देहपरिवर्तन के पश्चात यह बात विशेष रूप से सामने आई कि बड़े-बड़े ग्रंथों का प्रकाशन दुर्लभ सा होता जा रहा है। छोटे-छोटे ग्रंथों तो समाज आसानी से प्रकाशित करती रहती है, किंतु बड़े ग्रंथों पर बड़ी राशि व्यय होने के कारण बृहद ग्रंथों का प्रकाशन दुर्लभ हो गया है। इस दिशा में ट्रस्ट ने अपने नित्य बोधक तीर्थ जिनवाणी के प्रचार प्रसार के उद्देश्य की पूर्ति हेतु अनुकर्णीय कदम उठाया है। ट्रस्ट द्वारा महाविद्यालय के साथ-साथ सत् साहित्य प्रकाशन विभाग भी जयपुर में खोला गया। और एक प्रकाशन समिति भी गठित की गई थी जिसके द्वारा प्राचीन दिगंबर जैन बड़े-बड़े ग्रंथ नियमित रूप से कम से कम कीमत में घर घर पहुंचाए जाते हैं। इसके उपरांत तमिल भाषा एवं कन्नड़ भाषा में भी शास्त्रों का प्रकाशन भी मद्रास एवं बेंगलुरु से चलता रहता है। जयपुर से भी प्रकाशन विभाग का कार्य भी किया जाता है। इसी के साथ दक्षिण भारत में कर्नाटक आंध्र एवं तमिलनाडु में भी प्राचीन दिगंबर जैन शास्त्र-ताडपत्र ग्रंथ के रूप में उपलब्ध होते हैं, उनकी सूची बनाकर उन्हें सुरक्षित रखना हमारा परम कर्तव्य है। इस हेतु जैन लिटरेचर, रिसर्च इंस्टिट्यूट की सहायता भी बेंगलुरु में इस ट्रस्ट ने की है। तमिलनाडु में साहित्य सर्वेक्षण कार्य को आरंभ करने हेतु तथा प्राचीन दिगंबर जैन ताडपत्री शास्त्रों को सुरक्षित रखने का कार्य भी विगत कई वर्षों से ट्रस्ट द्वारा किया जाता रहा है।